Wednesday, 14 October 2015

"मुक्तक दिवस- 120" कुलदीप ब्रजवासी जी का पुरस्कृत मुक्तक

बराबर काम करता है मगर तनखा नहीं पूरी |

कुशल मंगल अनुज घर हो करें यह सोच मजदूरी |


जरूरत है जिसे शिक्षा की उसके हाथ में ईंटें,


जताती बेबसी को ये रहीं जो भी हैं मजबूरी |


- कुलदीप ब्रजवासी

"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" अरविन्द उनियाल 'अनजान' जी की पुरस्कृत रचना


बाबाजी को अक्सर मैंने ,रात जागते देखा है ।

वृद्धालय में हँसते-हँसते, दर्द फांकते देखा है ।


देख बुढ़ापे में जिस माँ को, बेघर तूने कर डाला,
तेरी खातिर मैने उसको, दुआ मांगते देखा है ।


प्रात जागती है आशाएँ , शाम टूटती उम्मीदें,
किसने करवट लेती माँ को, रात काटते देखा है ?


हर आहट पर कान लगे हैं, बेटा लेने आएगा,
मरते दम तक बाबाजी को, राह ताकते देखा है ।


पोता कितना बड़ा हुवा है, नया हुवा क्या आँगन में?
बूढ़ी आँखों को ये ढेरों प्रश्न, पालते देखा है ।


कोने में अब बैठे रहते होली, ईद , दिवाली पर,
माँ, बापू को अंतर्मन में, जख्म सालते देखा है ।


हँसकर जीवन जीते बाबा, फिर भी इनकी आँखों से,
मन की पीड़ा का आंसू 'अनजान' झाँकते देखा है।


-अरविन्द उनियाल 'अनजान' 

Tuesday, 6 October 2015

"मुक्तक दिवस - 119" बनवारी लाल मूरख बिसलपुरी जी का पुरस्कृत मुक्तक


एक तूफान उसके अन्दर है.

फिरभी दिलकी जमीन बंजर है.
नोके मिजगाँ पे जो कि ठहरा वो..
ग़म का कतरा नहीं,समन्दर है.
-मूरख,बीसलपुरी

Wednesday, 30 September 2015

मुक्तक दिवस - 118 प्रीति शर्मा जी का पुरस्कृत मुक्तक


आसमाँ तुझको झुका के,आज मैं दिखलाऊँगा।

हौंसलों से सीढियाँ मैं,तुझ तलक ले आऊँगा।

दे सके जितनी चुनौती,तू मुझे दे ले अभी,

आज माथे पर तेरेअपनी फतह लिख जाऊँगा।


-प्रीति शर्मा 

Tuesday, 29 September 2015

"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" दीपक शुक्ला जी की पुरस्कृत रचना


जिन्दगी भर डराती रही जिंदगी
उम्र बढती रही और घटी’ जिंदगी

जन्म कितने मिले हैं पता ही नहीं
क्या पता हो यही आखिरी जिंदगी

जख्म मिलते रहे जिन्दगी को सदा
और करती रही शायरी जिंदगी

एक दिन बेवफाई दिखाती है ये
हो मेरी या की हो फिर तेरी जिंदगी

आदमी बन सका जो नहीं उम्र भर
जी रहा बस यहाँ नाम की जिंदगी

जिन्दगी पा गयी जिस घड़ी मौत को
मौत भी पा गयी उस घड़ी जिन्दगी

और कितना बयाँ मैं करूँ जीस्त को
तीरगी तिश्नगी बेबसी जिंदगी

रौशनी के लिए "दीप" जलता रहा
और जलती रही "दीप" की जिंदगी

-दीपक कुमार शुक्ला

"मुक्तक दिवस 117" वीरेंद्र बेताब जी का पुरस्कृत मुक्तक


कमी छोड़ दी क्यूँ , बनाने में मुझको |

ख़ता क्या थी मेरी , ऐ ख़ालिक जहाँ के |

भुगतना ही है , अब तो कर्मों को अपने,

मुझे हौंसला दे , ऐ मालिक जहाँ के |

-विरेन्द्र बेताब


Monday, 14 September 2015

"मुक्तक दिवस - 116" विनोद राजपूत जी का पुरस्कृत मुक्तक


जीव जगत में हर प्राणी की अपनी अलग कहानी है।

सबका निश्चित कर्म जमीं पर होती अलग निशानी है।
करते सब संघर्ष जहाँ में जीवन यापन करने को,
छोटा हो या बड़ा जगत में सबका दाना पानी है।
-विनोद राजपूत साँवरिया