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Wednesday, 14 October 2015
"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" अरविन्द उनियाल 'अनजान' जी की पुरस्कृत रचना
बाबाजी को अक्सर मैंने ,रात जागते देखा है ।
वृद्धालय में हँसते-हँसते, दर्द फांकते देखा है ।
देख बुढ़ापे में जिस माँ को, बेघर तूने कर डाला,
तेरी खातिर मैने उसको, दुआ मांगते देखा है ।
प्रात जागती है आशाएँ , शाम टूटती उम्मीदें,
किसने करवट लेती माँ को, रात काटते देखा है ?
हर आहट पर कान लगे हैं, बेटा लेने आएगा,
मरते दम तक बाबाजी को, राह ताकते देखा है ।
पोता कितना बड़ा हुवा है, नया हुवा क्या आँगन में?
बूढ़ी आँखों को ये ढेरों प्रश्न, पालते देखा है ।
कोने में अब बैठे रहते होली, ईद , दिवाली पर,
माँ, बापू को अंतर्मन में, जख्म सालते देखा है ।
हँसकर जीवन जीते बाबा, फिर भी इनकी आँखों से,
मन की पीड़ा का आंसू 'अनजान' झाँकते देखा है।
-अरविन्द उनियाल 'अनजान'
Tuesday, 6 October 2015
Wednesday, 30 September 2015
Tuesday, 29 September 2015
"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" दीपक शुक्ला जी की पुरस्कृत रचना
जिन्दगी
भर डराती रही जिंदगी
उम्र
बढती रही और घटी’ जिंदगी
जन्म
कितने मिले हैं पता ही नहीं
क्या
पता हो यही आखिरी जिंदगी
जख्म
मिलते रहे जिन्दगी को सदा
और
करती रही शायरी जिंदगी
एक
दिन बेवफाई दिखाती है ये
हो
मेरी या की हो फिर तेरी जिंदगी
आदमी
बन सका जो नहीं उम्र भर
जी
रहा बस यहाँ नाम की जिंदगी
जिन्दगी
पा गयी जिस घड़ी मौत को
मौत
भी पा गयी उस घड़ी जिन्दगी
और
कितना बयाँ मैं करूँ जीस्त को
तीरगी
तिश्नगी बेबसी जिंदगी
रौशनी
के लिए "दीप" जलता रहा
और
जलती रही "दीप" की जिंदगी
-दीपक कुमार शुक्ला
Monday, 14 September 2015
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