"मुक्तक दिवस - 122" प्रह्लाद पारीक जी का पुरस्कृत मुक्तक
कभी कभी लगती हो मेरी ग़ज़लों पर तुम दाद प्रिये |
चलता रहता मन ही मन में तुम से क्यों संवाद प्रिये ?
तुम्हें न कह पाया मैं अपना, दूरी भी सह सका नहीं,
जीवन को क्या मोड़ दे गयी शेष तुम्हारी याद प्रिये |
-प्रहलाद पारीक
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