शुभमस्तु --- दिल से कलम तक
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Tuesday, 3 November 2015
"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" अल्पना सुहासिनी जी की पुरस्कृत रचना
ये मुस्कुराती बेटियाँ, ये खिलखिलाती बेटियाँ .
लगती हमें भली बहुत ये गुनगुनाती बेटियाँ.
ये पंख जो फैलायें तो आसमान चूम लें
ये पंख जो फैलायें तो आसमान चूम लें
एक ही क़दम मॆ ये जहान सारा घूम लें.
भले ही दर्द से रहा हो रात दिन का वास्ता,
मिले जो नन्ही सी खुशी तो उस खुशी मॆ झूम लें.
न जाने कैसे लोक से हैं आती जाती बेटियाँ.
न जाने कैसे लोक से हैं आती जाती बेटियाँ.
ये मुस्कुराती बेटियाँ, ये खिलखिलाती बेटियाँ .
लगती हमें भली बहुत ये गुनगुनाती बेटियाँ.
माँ के ममत्व से भरी, बहन के प्यार सी खरी,
माँ के ममत्व से भरी, बहन के प्यार सी खरी,
बीवी के सेवा त्याग के भाव से रहे भरी.
हरेक रूप मॆ जंचे, हरेक रूप मॆ फबे,
साहस की प्रतिमा बन शोलों से भी नहीं डरी.
देश की रक्षा को जां पे खेल जाती बेटियाँ.
देश की रक्षा को जां पे खेल जाती बेटियाँ.
ये मुस्कुराती बेटियाँ, ये खिलखिलाती बेटियाँ.
लगती हमें भली बहुत ये गुनगुनाती बेटियाँ.
-अल्पना सुहासिनी
Wednesday, 14 October 2015
"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" अरविन्द उनियाल 'अनजान' जी की पुरस्कृत रचना
बाबाजी को अक्सर मैंने ,रात जागते देखा है ।
वृद्धालय में हँसते-हँसते, दर्द फांकते देखा है ।
देख बुढ़ापे में जिस माँ को, बेघर तूने कर डाला,
तेरी खातिर मैने उसको, दुआ मांगते देखा है ।
प्रात जागती है आशाएँ , शाम टूटती उम्मीदें,
किसने करवट लेती माँ को, रात काटते देखा है ?
हर आहट पर कान लगे हैं, बेटा लेने आएगा,
मरते दम तक बाबाजी को, राह ताकते देखा है ।
पोता कितना बड़ा हुवा है, नया हुवा क्या आँगन में?
बूढ़ी आँखों को ये ढेरों प्रश्न, पालते देखा है ।
कोने में अब बैठे रहते होली, ईद , दिवाली पर,
माँ, बापू को अंतर्मन में, जख्म सालते देखा है ।
हँसकर जीवन जीते बाबा, फिर भी इनकी आँखों से,
मन की पीड़ा का आंसू 'अनजान' झाँकते देखा है।
-अरविन्द उनियाल 'अनजान'
Tuesday, 6 October 2015
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