बाबाजी को अक्सर मैंने ,रात जागते देखा है ।
वृद्धालय में हँसते-हँसते, दर्द फांकते देखा है ।
देख बुढ़ापे में जिस माँ को, बेघर तूने कर डाला,
तेरी खातिर मैने उसको, दुआ मांगते देखा है ।
प्रात जागती है आशाएँ , शाम टूटती उम्मीदें,
किसने करवट लेती माँ को, रात काटते देखा है ?
हर आहट पर कान लगे हैं, बेटा लेने आएगा,
मरते दम तक बाबाजी को, राह ताकते देखा है ।
पोता कितना बड़ा हुवा है, नया हुवा क्या आँगन में?
बूढ़ी आँखों को ये ढेरों प्रश्न, पालते देखा है ।
कोने में अब बैठे रहते होली, ईद , दिवाली पर,
माँ, बापू को अंतर्मन में, जख्म सालते देखा है ।
हँसकर जीवन जीते बाबा, फिर भी इनकी आँखों से,
मन की पीड़ा का आंसू 'अनजान' झाँकते देखा है।
-अरविन्द उनियाल 'अनजान'

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