Tuesday, 6 October 2015

"मुक्तक दिवस - 119" बनवारी लाल मूरख बिसलपुरी जी का पुरस्कृत मुक्तक


एक तूफान उसके अन्दर है.

फिरभी दिलकी जमीन बंजर है.
नोके मिजगाँ पे जो कि ठहरा वो..
ग़म का कतरा नहीं,समन्दर है.
-मूरख,बीसलपुरी

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