Tuesday, 29 September 2015

"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" दीपक शुक्ला जी की पुरस्कृत रचना


जिन्दगी भर डराती रही जिंदगी
उम्र बढती रही और घटी’ जिंदगी

जन्म कितने मिले हैं पता ही नहीं
क्या पता हो यही आखिरी जिंदगी

जख्म मिलते रहे जिन्दगी को सदा
और करती रही शायरी जिंदगी

एक दिन बेवफाई दिखाती है ये
हो मेरी या की हो फिर तेरी जिंदगी

आदमी बन सका जो नहीं उम्र भर
जी रहा बस यहाँ नाम की जिंदगी

जिन्दगी पा गयी जिस घड़ी मौत को
मौत भी पा गयी उस घड़ी जिन्दगी

और कितना बयाँ मैं करूँ जीस्त को
तीरगी तिश्नगी बेबसी जिंदगी

रौशनी के लिए "दीप" जलता रहा
और जलती रही "दीप" की जिंदगी

-दीपक कुमार शुक्ला

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