Tuesday, 8 September 2015

“मुक्तक दिवस -115” डॉ शैलेन्द्र उपाध्याय जी का पुरस्कृत मुक्तक


उड़ना, है हिम्मत की गाथा, सुन लो, मेरे राज-दुलारे |

ऊपर उठने की कोशिश में, गिरना भी संभव है प्यारे |

पंख तले बस हवा थामकर एक बारगी कूद पड़ो तुम,

अगर गिरे तो तुम्हें थामने, पिता खड़े हैं बाँह पसारे |


^^^डॉ शैलेन्द्र उपाध्याय^^^

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