Thursday, 21 August 2014

"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" (श्रेष्ठ रचना)

रोशनी ने श्याम पट पर हाथ फ़ेरा!
रात बीती! साफ़ निकला है सवेरा!
देखकर सूरज निकलता, दूर से ही,
भोर से डर, मुँह छिपा भागा अँधेरा!
रात भर, लड़ते रहे तारे सितारे!
सूर्य निकला, खुद लगाने एक फ़ेरा!
डाँटता-पुचकारता, घूमा जहाँ भर
दोपहर भर, क्रोध से नजरें तरेरा!
हर तरफ़ हर चीज दिखती अब जगह पर,
किस अदा से, पेड़ झरनों को उकेरा!
कौन, उसको, देख पाया रंग भरते,
है बहुत चालाक, अम्बर का चितेरा!
बाँटता किरणें, नई ताकत धरा को,
रथ उठाकर, देख किस-किसको गुरेरा!
शर्म से या क्रोध से, मैं क्या बताऊँ,
लाल होती शाम, हर घर का मुँडेरा!
चाँद जाकर छिप गया आई अमावस,
तीरगी का, रात फ़िर, होगा बसेरा!
रोज अपने पैंतरे, ये आजमाते!
दिन! सुनो, है रात का भाई चचेरा!

-शैलेन्द्र उपाध्याय

No comments:

Post a Comment