Thursday, 21 August 2014

"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" (सर्वश्रेष्ठ रचना)

चाँद की पलकों तले भी तम घना है
चांदनी का दिल मगर फिर भी फना है
दर्द आँखों में लिये अंबर बेचारा
सोचता है तीरगी में डूबना है
जब रवि घूंघट किये जा छिप गया तो
रौशनी का दिल हुआ कुछ अनमना है
इक अँधेरा था बसा दिल में कही पर
रौशनी का घर वहीं पर ही बना है
है तलब तेरी मुहब्बत की मुझे पर
आँख में बाकी मिरे अब भी अना है
स्याह तनहा रात का आलम हुआ अब
अक्स तेरा उस सियाही में सना है
भूल कर भी ये कभी मत सोचना तुम
तीरगी ही तीरगी को झेलना है
फिर सुबह होगी 'रमा' इक रौशनी की
तब मिटेगा तम यही संभावना है
~रमा वर्मा~ (१८-६-१४)

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