Thursday, 21 August 2014

"अभिव्यक्ति -मन से कलम तक" (सराहनीय रचना)

दिल उसी को चाहता है बारहा ,
राह में जो छोड़ता है बारहा !
क्या वफ़ा के जानता है मायने ,
बेवफा जो बोलता है बारहा !
तीरगी हर सूं बसा के याद में ,
पल ख़ुशी के खोजता है बारहा !
दाग चेहरे के उसे दिखते नहीं ,
आइनों को कोसता है बारहा !
पास था वो तो नज़र आया नहीं ,
अब मधुर क्या सोचता है बारहा !

प्रह्लाद रॉय चंदेल मधुर"

"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" (उत्तम रचना)

बदल गये हैं मंजर सारे
बदल गया है गाँव प्रिये!
मोहक ऋतुएँ नहीं रहीं अब
साथ तुम्हारे चली गईं!
आशाएँ भी टूट गईं जब
हाथ तुम्हारे छली गई!
बूढ़ा पीपल वहीं खड़ा पर
नहीं रही वो छाँव प्रिये!
बदल गये हैं....
पोर पोर अंतस का दुखता
दम घुटता पुरवाई में!
रो लेता हूँ खुद से मिलकर
सोच तुम्हें तन्हाई में!
मीठी बोली भी लगती है
कौए की अब कांव प्रिये!
बदल गये हैं....
चिट्ठी लाता ले जाता जो
नहीं रहा वो बनवारी!
धीरे धीरे उजड़ गये सब
बाग बगीचे फुलवारी!
बैठूँ जाकर पल दो पल मैं
नहीं रही वो ठांव प्रिये!
बदल गये हैं....
पथरीली राहों के ठोकर
जाने कितने झेल लिए!
सारे खेल हृदय से अपने
बारी बारी खेल लिए!
कदम कदम पर जग जीता हम
हार गये हर दाँव प्रिये!
बदल गये हैं....
पीड़ा आज चरम पर पहुँची
नदी आँख की भर आई!
दूर तलक है गहन अँधेरा
बना जमाना हरजाई!
फिर भी चलता जाता हूँ मैं
भले थके हैं पाँव प्रिये!
बदल गये हैं....

-धीरज श्रीवास्तव

"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" (श्रेष्ठ रचना)

रोशनी ने श्याम पट पर हाथ फ़ेरा!
रात बीती! साफ़ निकला है सवेरा!
देखकर सूरज निकलता, दूर से ही,
भोर से डर, मुँह छिपा भागा अँधेरा!
रात भर, लड़ते रहे तारे सितारे!
सूर्य निकला, खुद लगाने एक फ़ेरा!
डाँटता-पुचकारता, घूमा जहाँ भर
दोपहर भर, क्रोध से नजरें तरेरा!
हर तरफ़ हर चीज दिखती अब जगह पर,
किस अदा से, पेड़ झरनों को उकेरा!
कौन, उसको, देख पाया रंग भरते,
है बहुत चालाक, अम्बर का चितेरा!
बाँटता किरणें, नई ताकत धरा को,
रथ उठाकर, देख किस-किसको गुरेरा!
शर्म से या क्रोध से, मैं क्या बताऊँ,
लाल होती शाम, हर घर का मुँडेरा!
चाँद जाकर छिप गया आई अमावस,
तीरगी का, रात फ़िर, होगा बसेरा!
रोज अपने पैंतरे, ये आजमाते!
दिन! सुनो, है रात का भाई चचेरा!

-शैलेन्द्र उपाध्याय

"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" (सर्वश्रेष्ठ रचना)

चाँद की पलकों तले भी तम घना है
चांदनी का दिल मगर फिर भी फना है
दर्द आँखों में लिये अंबर बेचारा
सोचता है तीरगी में डूबना है
जब रवि घूंघट किये जा छिप गया तो
रौशनी का दिल हुआ कुछ अनमना है
इक अँधेरा था बसा दिल में कही पर
रौशनी का घर वहीं पर ही बना है
है तलब तेरी मुहब्बत की मुझे पर
आँख में बाकी मिरे अब भी अना है
स्याह तनहा रात का आलम हुआ अब
अक्स तेरा उस सियाही में सना है
भूल कर भी ये कभी मत सोचना तुम
तीरगी ही तीरगी को झेलना है
फिर सुबह होगी 'रमा' इक रौशनी की
तब मिटेगा तम यही संभावना है
~रमा वर्मा~ (१८-६-१४)

Thursday, 14 August 2014

"मुक्तक" सरिता

बेकरारी यहाँ और फुहारें भी थी
कुछ सूखा भी था कुछ बौछारें भी थी
दिल की बातों को दिल में दबाया सनम,
प्यार तो था मगर कुछ दीवारें भी थी |(1)

इश्क़ और प्यार की सर जमीं थी यहाँ
कुछ कमी थी वहाँ कुछ कमी थी यहाँ
जज्बातों को हमने छिपाया सनम,
नीर उनके बहे पर नमी थी यहाँ |(2)
-गुरचरन मेहता 'रजत'


रात, हर उम्मीद को, काले समन्दर में छिपाये
और फ़िर हर इक सुबह, सूरज नया कोई उगाये
कौन है वो हर तरफ़ मौजूद है जो इस जहाँ में,
जो खुशी को और गम को एक दूजे में मिलाये |(1)

इस जहाँ का वो चितेरा, दूर से करतब दिखाये
देखने की, है कसर, वो हर नजर से मुसकुराये
चाहता, हर पल खुदा, अपने बनाये, आदमी से,
प्यार दे सबको खुशी दे और खुद भी प्यार पाये |(2)
-शैलेन्द्र उपाध्याय


 मिल गये हैं दिल, कभी भी अब जुदा होंगे नहीं
जिस्म हो जायें फ़ना, ये दिल फ़ना होंगे नहीं
शक्ल में महबूब की, आये नज़र मुझको ख़ुदा,
सर झुका है बन्दगी में , बेवफ़ा होंगे नहीं |(1)
-अनीता मेहता


प्रीत का बंधन है ये, सच दो दिलों का है मिलन
प्यार,चाहत ,इश्क़ क्या है?अनछुई सी इक छुअन
डूबकर इस इश्क़ के दरिया में कितने बह गए,
पार होने के लिए करते रहे कितने जतन ।(1)

प्रेम पथिक बन जीवन पथ पर कदम बढ़ा और चलता जा
विह्वल मन को धीर बंधाकर खुशियों के पल मलता जा
प्रेम का बंधन बड़ा सरल है विरले समझ सके इसको,
इस बंधन में बंध जा प्यारे जग से पार निकलता जा ।(2)
मनोज कुमार "मनमीत"


मुहब्बत के समंदर में कोई साहिल नहीं होता
किसी के दर्द में कोई यहाँ शामिल नहीं होता
खुदा जाने खुदा को मुझसे कुछ तकलीफ है शायद,
मैं जो भी चाहता हूँ वो मुझे हासिल नहीं होता |(1)

प्यार जब से हुआ, दिल चहकने लगा
पुष्प लाखों खिले, सब महकने लगा
हम फना हो गए, प्यार की आग में
दिल भी जलने लगा, तन दहकने लगा |(2)
-विशाल अग्रवाल "सुशोभित"


हार या जीत कभी प्रेम का आधार नहीं होता है
साथ चलता हर शख्स भी वफादार नहीं होता है
थाम कर दिल की धड़कनों को तुम सम्हाल कर रखना,
चन्द लम्हों का ये सफर कभी प्यार नहीं होता है।(1)

प्रवासी पंछियों से भूलकर इजहार मत करना
भरोसा लाख दे जायें,मगर इकरार मत करना
अमीरी का शज़र खुशियों की छाया दे नहीं सकता,
सिर्फ भोली अदाओं पर किसी से प्यार मत करना।(2)
-विनोद राजपूत


प्रेम जीवन का आधार है
भीनी सी वसंत बयार है
हर हृदय में वास है इसका
प्रेममय सारा संसार है |(1)

प्रेम सदा प्रेरित करता है
मन को आनंदित करता है
शक्ति बनकर साथ है रहता
प्रेम सदा गर्वित करता है |(2)
-वैशाली चतुर्वेदी


मदिर कितना, मधुर कितना, सुखद एहसास होता है
जुदा होकर भी वो हर-पल जिगर के पास होता है
अनोखी रीति है यह प्रेम की सदियों से दुनिया में
मिलन में भी विरह का कुछ न कुछ आभास होता है |(1)
-डॉ नीलम श्रीवास्तव 


क्यों लगता है मुझको ऐसा घर मेरा वृन्दावन हो
तुम राधा का रूप धरो और मेरा दिल भी मोहन हो
युगों-युगों की प्यास समेटे अक्सर मन ये कहता है
तुम आओ तो प्रियतम मेरे सहरा में भी सावन हो |(1)

कभी-कभी लगती हो मेरी ग़ज़लों पर तुम दाद प्रिये
चलता रहता मन ही मन में तुम से क्यों संवाद प्रिये?
तुम्हें न कह पाया मैं अपना, दूरी भी सह सका नहीं,
जीवन को क्या मोड़ दे गयी शेष तुम्हारी याद प्रिये |(2)
-प्रहलाद पारीक


प्रेम सर्वदा शाश्वत है, प्रेम है अतुलित अनुराग
प्रेम मय विश्व है प्रेमी मानव रहता वीतराग
परिभाषा प्रेम की अनंत, अनंत इसकी व्यापकता
और अनंत ही होता निष्काम प्रेमी का यह त्याग |(1)

प्रेम भक्ति है, प्रेम है साधना, प्रेम लक्ष्य विश्वास
प्रेम हीन मानव नर नहीं पैशाचिक उसका प्रयास
प्रेमानुभूति समझे जो जन, उनसे बढ़कर न कोई
विषय वासना रहित प्रीत ही लाती ईश्वर को पास |(2)
-सुरेश चौधरी


सबकी ममता समान होती है
कैसे- कैसे बयान होती है
एक गूंगी से पूछ कर देखो,
कैसी माँ की जुबान होती है |(1)
-डी.के.नगाइच रोशन


जब कभी तन्हा हुए गुज़रा ज़माना याद आया
फिर अधूरा सा वही सपना सुहाना याद आया
रूठना फिर मान जाना, वो शरारत से सताना,
दूर जाकर पास आने का बहाना याद आया | (1)

हसीं इक मोड़ पर अंजान वो साथी मिला था  
कभी तन्हा रहा दिल जो, गुलों सा वो खिला था  
अचानक यूँ किरणकोई नहीं मिलता किसी से,
हमारी ही दुआओं का हसीं वो इक सिला था | (2)
-विनिता सुराना 'किरण'