जलूं गम से, मगर ऐ हमनवा
तुझ को बचा लूँ मैं|
न मिलना था, न मिल पाये, मगर चाहा
इबादत सा,
बिखरते रेत से सब ख़्वाब हैं, इनको उठा लूं
मैं|
हमारा साथ जन्मों का पुराना, है नहीं अब का,
रगों में जो लहू बहता, उसे कैसे जमा
लूँ मैं|
लबों पे आह थी, दीदार पाने को
खड़े थे हम,
जहाँ पे थे कदम तेरे, वहीं पे सर
झुका लूँ मैं|
कभी तो ऐ दिले नादान, तू ये जान ही
लेगा,
मुहब्बत तो ख़ुदा का नाम है, दिल में बसा
लूँ मैं|
बुझेगी ओस चाटे से कभी ये प्यास क्या अपनी ,
बना लूँ मौत को अपना, 'अना' खुद को जला
लूं मैं|
©अनीता मेहता 'अना'

बहुत उम्दा ख़याल और खूबसूरत ग़ज़ल के सम्मान के लिए बहुत सी मुबारकबादें.. ..
ReplyDeletesundar rachna
ReplyDeleteखूबसूरत ग़ज़ल ! हार्दिक बधाई आपको Anita Mehta जी :)
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