दोहा
छंद (पुरस्कृत रचना)
खिली
कुमुदिनी देख कर,हुआ चाँद बेचैन|
रातों
के आगोश में,मिलती
उनके नैन|| १.
कनक
सरीखी भोर है,श्वेत
रंग सी रात|
मंगलमय
वातावरण,बरसाती
सौगात|| २.
©कुमुद नयना
दोहा छंद (पुरस्कृत रचना)
तपती
धरती पर गिरी, यूँ
औचक जलधार|
बिना
भूमिका ज्यों करे, वक्ता व्यक्त विचार|| १.
पहली
बारिश में हुई, दुल्हनिया
लाचार|
इत
बूँदन के वार हैं, उत मच्छर की मार|| २.
©डॉ गोपाल राजगोपाल
दोहा छंद (सराहनीय रचना)
बादल
गरजे जोर से ,घिरी
घटा घनघोर|
रास
रचाने दामिनी ,चली
गगन की ओर|| १.
पेड़ों
को मत काटिये ,करिये
इनसे प्यार|
जीवन
हैं ये जगत का ,कुदरत
का उपहार|| २.
©भारती जैन
दोहा छंद (सराहनीय रचना)
सावन
की रुत आ गई, रिमझिम
पड़े फुहार|
भीगे
मन आँगन सखी.....भीगे पी का प्यार|| १.
मधुवन
सुरभित हो उठा, बरसे
नभ से प्रीत|
झूम-झूम
सब गा रहे ,मिल
कर पावस गीत|| २.
©रमा वर्मा
दोहा छंद (सराहनीय रचना)
रंगों
से अम्बर सजा, सजा
धरा का रूप|
आँगन
उपवन वाटिका, लगते
बहुत अनूप||
सावन
आया झूम के, रिमझिम
गिरे फुहार|
बागों
में झूले सजे, गूँज
रही मल्हार||
©वैशाली
चतुर्वेदी




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