Thursday, 10 July 2014

"अभिव्यक्ति --- मन से कलम तक" में पुरस्कृत रचना (ग़ज़ल)

उठे इस दर्द के तूफ़ान को खुद में समा लूँ मैं,
जलूं गम से, मगर ऐ हमनवा तुझ को बचा लूँ मैं|

न मिलना था, न मिल पाये, मगर चाहा इबादत सा,
बिखरते रेत से सब ख़्वाब हैं, इनको उठा लूं मैं|

हमारा साथ जन्मों का पुराना, है नहीं अब का,
रगों में जो लहू बहता, उसे कैसे जमा लूँ मैं|

लबों पे आह थी, दीदार पाने को खड़े थे हम,
जहाँ पे थे कदम तेरे, वहीं पे सर झुका लूँ मैं|

कभी तो ऐ दिले नादान, तू ये जान ही लेगा,
मुहब्बत तो ख़ुदा का नाम है, दिल में बसा लूँ मैं|

बुझेगी ओस चाटे से कभी ये प्यास क्या अपनी ,
बना लूँ मौत को अपना, 'अना' खुद को जला लूं मैं|

©अनीता मेहता 'अना'

3 comments:

  1. बहुत उम्दा ख़याल और खूबसूरत ग़ज़ल के सम्मान के लिए बहुत सी मुबारकबादें.. ..

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  2. खूबसूरत ग़ज़ल ! हार्दिक बधाई आपको Anita Mehta जी :)

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