Thursday, 10 July 2014

मुक्तक बहार

एक चन्द्रमा बादल पीछे, एक छिपा है चिलमन में|

एक गगन में एक चमकता, मेरे घर के आँगन में|

कभी इधर तो कभी उधर है, किस को देखे प्यार करे,

सोच रहा बेचारा चातक, आज पड़ा है उलझन में|
©हितेश शर्मा पथिक

गए पिया परदेस साँवरे|

नैना मोरे हुए बाँवरे|

विरहअग्नि में जलती पल-पल,

कब आओगे लौट गाँव रे| 
©Satish Chandra Sachan


नागिन सी जुल्फें लहराकर, गौरी जब मधुवन में आये|

छनक-छनक जब पायल बाजे, तब भँवरों का दिल खो जाये|

लहराते बालों की खुशबू, मधुवन सुरभित कर जाती है,

देख रूप की मादकता को, अम्बर पर चंदा मुसकाये| 
©रमा वर्मा 


बिरहन रैन कहाँ से आई, अंसुवन कजरा धुलता जाए|

प्रीत निगोड़ी ऐसी लागी, पल-पल जियरा डूबा जाए|

पी आवन की आस में मैं तो, बैठी निस दिन पंथ निहारूं,

ये श्रृंगार सहेजूँ कब तक, कंगन झुमका चुभता जाए|
©प्रह्लाद रॉय चंदेल ‘मधुर’

आज के युग में वो समाज गूंगा बहरा है|

जहाँ नयी सोच पर रिवाजों का पहरा है|

बहते विचारों पर बांध बनाकर देखा,

जहाँ कभी दरिया था वहां अब सहरा है|
©डॉ एम एल गुप्ता ‘निनाद’

मौन समन्दर हो जायें पर सरिता बोला करती है|

नम्र निवेदन में उनके बस नमिता बोला करती है|

लाख छिपा लें परदों में पर सत्य नहीं छिप पायेगा,

मूक भले कवि हो जायें पर कविता बोला करती  है|
©भावना मेहरा

टूट-बिखरता नश्वर जीवन, केवल चार कदम का दम|

कभी लगे ये पल युग जैसे, और कभी ये लगते कम|

हर इक पल, हमने सीखा, बस अपनी शर्तों पर जीना,

खुद से मिलती, अपनी आँखें! जिनमें उठते-गिरते हम|

©डा. शैलेन्द्र उपाध्याय







2 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर मुक्तकों को चुना गया, मुक्तक बहार में.. आप सभी को बहुत बहुत बधाइयां ..

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  2. सभी रचनाकारों को सुन्दर सार्थक मुक्तक सृजन के लिए हार्दिक बधाई :)

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