एक गगन में एक चमकता, मेरे घर के आँगन में|
कभी इधर तो कभी उधर है, किस को देखे प्यार करे,
सोच रहा बेचारा चातक, आज पड़ा है उलझन में|
©हितेश शर्मा “पथिक”
नैना मोरे हुए बाँवरे|
विरह–अग्नि में जलती पल-पल,
कब आओगे लौट गाँव रे|
©Satish Chandra
Sachan
छनक-छनक जब पायल बाजे, तब भँवरों का दिल खो
जाये|
लहराते बालों की खुशबू, मधुवन सुरभित कर जाती है,
देख रूप की मादकता को, अम्बर पर चंदा मुसकाये|
©रमा वर्मा
बिरहन रैन कहाँ से आई, अंसुवन कजरा
धुलता जाए|
प्रीत निगोड़ी ऐसी लागी, पल-पल जियरा डूबा जाए|
पी आवन की आस में मैं तो, बैठी निस दिन
पंथ निहारूं,
ये श्रृंगार सहेजूँ कब तक, कंगन झुमका चुभता जाए|
©प्रह्लाद रॉय चंदेल ‘मधुर’
आज के युग में वो समाज गूंगा बहरा है|
जहाँ नयी सोच पर रिवाजों का पहरा है|
बहते विचारों पर बांध बनाकर देखा,
जहाँ कभी दरिया था वहां अब सहरा है|
©डॉ एम एल गुप्ता ‘निनाद’
नम्र निवेदन में उनके बस नमिता बोला करती है|
लाख छिपा लें परदों में पर सत्य नहीं छिप पायेगा,
मूक भले कवि हो जायें पर कविता बोला करती है|
©भावना मेहरा
कभी लगे ये पल युग जैसे, और कभी ये
लगते कम|
हर इक पल, हमने सीखा, बस अपनी
शर्तों पर जीना,
खुद से मिलती, अपनी आँखें! जिनमें उठते-गिरते हम|
©डा. शैलेन्द्र उपाध्याय






बहुत ही सुन्दर मुक्तकों को चुना गया, मुक्तक बहार में.. आप सभी को बहुत बहुत बधाइयां ..
ReplyDeleteसभी रचनाकारों को सुन्दर सार्थक मुक्तक सृजन के लिए हार्दिक बधाई :)
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