Monday, 7 July 2014

जय माँ शारदे ! (प्रमाणिका छंद)

सँवार दो निखार दो।
सुबुद्धि को प्रसार दो।।
करो कृपा दयालु माँ ।
चिरायु हो सभी यहाँ ।।(1)

जबान में मिठास हो।
सरस्वती निवास हो।।
नवीन गीत गान हो।
विधा विशेष ज्ञान हो।।(2)

सदा करीब आस हो।
मुसीबतें न पास हो।।
हिले-मिले रहें सभी
न दूर हो ख़ुशी कभी।।(3)

कली कली निखार हो।
सुगंध का प्रसार हो।।
हरा-भरा जहान हो।
कभी न खंड मान हो।।(4)
©Vinita Surana 'Kiran'

12 comments:

  1. बहुत ही सुंदर शिल्प और भावों के साथ माँ शारदे की अनुपम वंदना... बहुत बधाई आपको.

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  2. सादर आभार उत्साहवर्धन व सराहना के लिए Dk Nagaich Roshan जी :)

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  3. प्रमानिका छंद की अपनी खूबसूरती है,,पञ्च चामर से आधी आवृति वाला यह छंद उमंग एवं जोश भरता है,दिनकर जी का यह प्रिय छंद था,आपने बहुत खूबसूरती से इसे निखारा बधाई

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  4. अत्यंत भावपूर्ण, और शिल्प पर खरी उतरती यह रचना बड़ी ही मनोहर है। आपको बहुत बहुत बधाई

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  5. शिल्प-विधान में बंधी हुई भावपूर्ण रचना :-)

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  7. सादर आभार Suresh Choudhary सर आपका स्नेह और आशिष रचना को देने के लिए :)

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  8. हार्दिक आभार Om Prakash Meghvanshi जी उत्साहवर्धन व सराहना के लिए :)

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  9. हार्दिक आभार Manoj Sharma जी उत्साहवर्धक सराहना के लिए :)

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  10. बहुत सुंदर !!

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  11. अच्छा लिखा है, बधाई हो मित्र। किन्तु सनातनी छंदों में उर्दू, अरबी, फारसी और आँग्ल भाषाओं के शब्द निषिद्ध हैं।

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  12. छ्न्द के साथ विधान अवश्य हो मित्र।

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