सुबुद्धि को प्रसार दो।।
करो
कृपा दयालु माँ ।
चिरायु
हो सभी यहाँ ।।(1)
जबान
में मिठास हो।
सरस्वती
निवास हो।।
नवीन
गीत गान हो।
विधा
विशेष ज्ञान हो।।(2)
सदा
करीब आस हो।
मुसीबतें
न पास हो।।
हिले-मिले रहें सभी।
न
दूर हो ख़ुशी कभी।।(3)
कली
कली निखार हो।
सुगंध
का प्रसार हो।।
हरा-भरा
जहान हो।
कभी
न खंड मान हो।।(4)
©Vinita Surana 'Kiran'

बहुत ही सुंदर शिल्प और भावों के साथ माँ शारदे की अनुपम वंदना... बहुत बधाई आपको.
ReplyDeleteसादर आभार उत्साहवर्धन व सराहना के लिए Dk Nagaich Roshan जी :)
ReplyDeleteप्रमानिका छंद की अपनी खूबसूरती है,,पञ्च चामर से आधी आवृति वाला यह छंद उमंग एवं जोश भरता है,दिनकर जी का यह प्रिय छंद था,आपने बहुत खूबसूरती से इसे निखारा बधाई
ReplyDeleteअत्यंत भावपूर्ण, और शिल्प पर खरी उतरती यह रचना बड़ी ही मनोहर है। आपको बहुत बहुत बधाई
ReplyDeleteशिल्प-विधान में बंधी हुई भावपूर्ण रचना :-)
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ReplyDeleteसादर आभार Suresh Choudhary सर आपका स्नेह और आशिष रचना को देने के लिए :)
ReplyDeleteहार्दिक आभार Om Prakash Meghvanshi जी उत्साहवर्धन व सराहना के लिए :)
ReplyDeleteहार्दिक आभार Manoj Sharma जी उत्साहवर्धक सराहना के लिए :)
ReplyDeleteबहुत सुंदर !!
ReplyDeleteअच्छा लिखा है, बधाई हो मित्र। किन्तु सनातनी छंदों में उर्दू, अरबी, फारसी और आँग्ल भाषाओं के शब्द निषिद्ध हैं।
ReplyDeleteछ्न्द के साथ विधान अवश्य हो मित्र।
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