"शुभमस्तु---दिल से कलम तक" ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है | "नवोदित साहित्यकार मंच" (फेसबुक पर संचालित) द्वारा निर्मित इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य मंच पर सक्रीय साहित्य के क्षेत्र से जुड़े युवा रचनाकारों की श्रेष्ठ रचनाओं का संकलन कर उन्हें देश-विदेश के पाठकों तक पहुंचाना तथा रचनाकारों को बेहतर सृजन के लिए प्रोत्साहित करना है | विशेष : ब्लॉग पर आने वाली रचनाओं की मौलिकता , या सम्बंधित किसी भी विवाद के लिए मंच या ब्लॉगर की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी.. शुभमस्तु !
Wednesday, 30 September 2015
Tuesday, 29 September 2015
"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" दीपक शुक्ला जी की पुरस्कृत रचना
जिन्दगी
भर डराती रही जिंदगी
उम्र
बढती रही और घटी’ जिंदगी
जन्म
कितने मिले हैं पता ही नहीं
क्या
पता हो यही आखिरी जिंदगी
जख्म
मिलते रहे जिन्दगी को सदा
और
करती रही शायरी जिंदगी
एक
दिन बेवफाई दिखाती है ये
हो
मेरी या की हो फिर तेरी जिंदगी
आदमी
बन सका जो नहीं उम्र भर
जी
रहा बस यहाँ नाम की जिंदगी
जिन्दगी
पा गयी जिस घड़ी मौत को
मौत
भी पा गयी उस घड़ी जिन्दगी
और
कितना बयाँ मैं करूँ जीस्त को
तीरगी
तिश्नगी बेबसी जिंदगी
रौशनी
के लिए "दीप" जलता रहा
और
जलती रही "दीप" की जिंदगी
-दीपक कुमार शुक्ला
Monday, 14 September 2015
Tuesday, 8 September 2015
“अभिव्यक्ति-मन से कलम तक” मनोज मानव जी की पुरस्कृत रचना
विधाता
छंद पर आधारित एक भक्ति गीत
मापनी
--1222 1222 1222 1222
किसे
कहते है सच्ची मित्रता तुमको बताते है |
सुदामा
और कान्हा का मिलन तुमको दिखाते है |
सुदामा
चल पड़ा देखो उसे कान्हा बुलाते है |
विचारों
के नये तूफ़ान उसको आ सताते है |
कभी
सोचे कि ये होगा कभी सोचे कि वो होगा,
उधर
मन मन उसे यूँ देख कान्हा मुस्कुरातें है |
सुदामा
सोचता क्या आज देगा वो कन्हैया को,
दिया
बीवी का वो सत्तू सलीके से छिपाते है |
किसे
कहते है-----
गुजारा
साथ कान्हा के करे है याद वह बचपन |
कभी
देखे फ़टी अपनी लँगोटी और अपना तन |
कदम
रोके कभी देखो कभी आगे बढ़ाता है,
मगर
उससे छिपा क्या हैं पढ़े है जो सभी का मन |
कभी
माखन चुराते थे कभी गैया चराते थे,
सभी
किस्से पुराने आज उसको याद आते है |
किसे
कहते है –
बड़ी
दिल में लिए हलचल सुदामा आज आते है |
उसी
का हाल कान्हा आज रुक्मण से बताते है |
तभी
सेवक बताते है सुदामा आ गए कान्हा,
सभी
कुछ छोड़ कान्हा दौड़ नंगे पाँव जाते है |
दिखाकर
आइना सबको ये कैसा खेल रच डाला,
कन्हैया
पाँव धोकर दूर पीड़ा को भगाते है |
किसे
कहते है ----
बड़ी
हैरान है रुक्मण भला ये कौन आते है |
तड़प
जिस मित्र की कान्हा गले लगकर मिटाते है |
लगे
उसको कि कान्हा आज पागल हो गये शायद,
सुदामा
पर कन्हैया आज लोकों को लुटाते हैं |
कन्हैया
तीन मुट्ठी अन्न पर ही बिक गए यारों,
दिखा
माया सभी को मित्र की कीमत बताते है |
किसे
कहते है ----
~~~(मनोज "मानव")~~
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