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Tuesday, 3 November 2015
"अभिव्यक्ति - मन से कलम तक" अल्पना सुहासिनी जी की पुरस्कृत रचना
ये मुस्कुराती बेटियाँ, ये खिलखिलाती बेटियाँ .
लगती हमें भली बहुत ये गुनगुनाती बेटियाँ.
ये पंख जो फैलायें तो आसमान चूम लें
ये पंख जो फैलायें तो आसमान चूम लें
एक ही क़दम मॆ ये जहान सारा घूम लें.
भले ही दर्द से रहा हो रात दिन का वास्ता,
मिले जो नन्ही सी खुशी तो उस खुशी मॆ झूम लें.
न जाने कैसे लोक से हैं आती जाती बेटियाँ.
न जाने कैसे लोक से हैं आती जाती बेटियाँ.
ये मुस्कुराती बेटियाँ, ये खिलखिलाती बेटियाँ .
लगती हमें भली बहुत ये गुनगुनाती बेटियाँ.
माँ के ममत्व से भरी, बहन के प्यार सी खरी,
माँ के ममत्व से भरी, बहन के प्यार सी खरी,
बीवी के सेवा त्याग के भाव से रहे भरी.
हरेक रूप मॆ जंचे, हरेक रूप मॆ फबे,
साहस की प्रतिमा बन शोलों से भी नहीं डरी.
देश की रक्षा को जां पे खेल जाती बेटियाँ.
देश की रक्षा को जां पे खेल जाती बेटियाँ.
ये मुस्कुराती बेटियाँ, ये खिलखिलाती बेटियाँ.
लगती हमें भली बहुत ये गुनगुनाती बेटियाँ.
-अल्पना सुहासिनी
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